दुनिया और दुनिया की चीजें सब थोथा है, सार समर्थ सन्त सतगुरु की दया से ही मिलेगा

  • अंतर में शब्द की ताकत मिलने पर बोली, दृष्टि आदि सबमें तेज दिखता है, पूरा व्यक्तित्व ही निखर जाता है

रेवाड़ी (हरियाणा)। जिस मन को बड़े-बड़े त्यागी तपस्वी कंट्रोल में नहीं कर पाए उसे पकड़ने का चिमटा रखने वाले, अंतर में शब्द को पकड़ाकर इस मनुष्य शरीर का सूनापन दूर करने वाले, शिक्षाप्रद दृष्टांत किस्से सुनकर गहरी बात आसानी से समझा देने वाले इस समय धरती पर मनुष्य शरीर में आये स्वयं प्रभु, मौजूदा वक़्त के महापुरुष सन्त सतगुरु दुःखहर्ता त्रिकालदर्शी परम दयालु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 7 अगस्त 2022 प्रातःकालीन बेला में बावल आश्रम, रेवाड़ी (हरियाणा) में दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि प्रभु प्राप्ति की, ज्ञान अर्जित करने की प्रथम सीढ़ी गुरु से प्रेम प्रीत करना है। 

देश-विदेश की सभी संगतों के लोग साप्ताहिक सतसंग बराबर करते रहो

जिस देश में प्रेमियों की संख्या कम हो या लोग दूर-दूर हो वो छुट्टी के एक दिन ऑनलाइन साप्ताहिक सतसंग कर लिया करें। साप्ताहिक सतसंग से बड़ा फायदा होता है। यह मन जिधर लग जाए, रम जाए उसी में लगा, रमा रहता है। आप लोग परमार्थी हो। आपको परमार्थ के बारे में जानकारी है कि यदि यह मन खेती गृहस्थी नौकरी व्यापार मजदूरी, शरीर के सुख के काम करने में ही लगा रह गया तो आत्मा यहां फंस जाएगी। फिर लौट-लौट 84 (लाख योनियों में) आना पड़ेगा। जो दुःखों का अनुभव आप लोग गृहस्थ आश्रम में कर रहे हो ये दुःख बराबर झेलते ही रहना पड़ेगा। और अगर शरीर से बुरा कर्म बन गया, मन ने इसे बुराईयों में लगा दिया तो नरकों में भी जाना पड़ सकता है।

मन का काम है चलते रहना, साप्ताहिक सतसंग मन को हटाने का है एक तरीका

मन जहां भी लग जाता है वहीं शरीर को, धन को भी लगा देता है। साप्ताहिक सतसंग मन को हटाने का एक तरीका है। उस दिन आप अपने मन को अपने दैनिक क्रिया से हटा कर चल पड़ते हो। इसमें आने में मन को लगाना चाहिए। जैसे कोई कर्मचारी (खरीददारी का समय) निश्चित कर लेता है। घर के लोग कहते हैं कि बाजार से सामान खरीदना है तो कहता है कि रविवार के दिन छुट्टी रहेगी तब खरीदेंगे। इसी तरह से मन इसमें भी लग जाता है कि आज छुट्टी का दिन है, सतसंग में चलना चाहिए। सतसंग में आने, सतसंग के वचन सुनने से गंदगी साफ होती है।

सतसंग जल जब कोई पावे, मैलाई सब कट-कट जावे।

सब जगह सुनाने वाले लोग नहीं मिलते हैं तो आपस में ही गुरु भक्ति की बात, गुरु की चर्चा करनी चाहिए। गुरु के बगैर कोई एक कदम भी आगे बढ़ नहीं पाया। इसलिए आये हुए सभी ऋषि मुनि योगी योगेश्वर सन्तों ने बराबर गुरु करने पर जोर दिया और तरह-तरह से गद्य में, पद्य में लोगों को लिखकर पढ़कर सुनाया बताया। कहा गया-

है सूना मनुष्य शरीर प्यारे गुरु बिना

कहा गया है जिसने गुरु नहीं किया है उसका यह शरीर सूना, शरीर में कुछ नहीं है। गुरु की दया अगर अंतर में जारी नहीं हुई तो समझो कुछ नहीं है। उदाहरण भी दिया-

तरुवर सूना डाल पात बिन, हृदय सूना ज्ञान सार बिन, ताल सून बिन नीर प्यारे गुरु बिना।।

तालाब की शोभा पानी भरे होने और हरे भरे किनारे से है। आदमी देखता है। सूखे तालाब को सूना कहा गया। पेड़ में अगर पत्ते नहीं रहेंगे, सीधा ठूंठ खड़ा रहेगा तो फिर कोई शोभा रहेगी? वह सूना ही लगेगा। और अगर हरे हरे पेड़ लगा दिए गए तो घर दरवाजे बगीचे की शोभा बढ़ जाती है। जिसको ज्ञान नहीं हुआ, जो सार शब्द को पकड़ा नहीं, असली चीज को पकड़ा नहीं, उसका ह्रदय सूना है। ज्ञान किसे कहते हैं?

दुनिया की चीजें यह सब थोथा है, सार गुरु की दया से मिलेगा

पढ़ाई लिखाई को विद्वता कहते हैं जैसे हिंदी अंग्रेजी जानने वाले, ज्यादा नंबर लाने वाले, बहुत मिलेंगे लेकिन उन्हें ज्ञान नहीं है। ज्ञान तो बोध को, अनुभव को कहते हैं। जैसे जानने से दर्द अनुभव नहीं होता लेकिन थप्पड़ घूंसा पड़ने से अनुभव हो जाएगा। ज्ञान वो जो अनुभव में आ जाये। 

सार शब्द को गह रहे, थोथा देई उड़ाय।

दुनिया की चीजें यह सब थोथा है। जैसे बच्चियां अनाज पटकते समय हल्का कचरा भूसा थोथा ऊपर उड़ा देती हैं और (अनाज) ठोस सार चीज रह जाता है ऐसे ही दुनिया, दुनिया की चीजें थोथा है क्योंकि ये छूट जाने वाली, एक जैसी नहीं रहने वाली चीजें है। लेकिन सार क्या है? 

अंतर में शब्द की ताकत मिलने पर बोली, दृष्टि सबमें तेज दिखता है, पूरा व्यक्तित्व ही निखर जाता है

सार वह शब्द है जिसे पकड़ने के लिए नामदान में आपको बताया गया। जब वह हृदय में आता है तो इस शरीर की शोभा बढ़ जाती है। कहते हैं कि कितना बढ़िया व्यक्तित्व, आकर्षण है। जैसे मेकअप की तुलना में सुडौल सुंदर शरीर ज्यादा सराहा जाता है क्योंकि ये बनावटी नहीं, असला है। जो भी सार तत्व को प्राप्त कर लेते हैं उनमें एक निखार आता है, उनका व्यक्तित्व बहुत अच्छा बन जाता है। अंतर में मिले रस से ताकत मिलती है। जब शब्द से जीवात्मा जुड़ जाती है तब उस ताकत से बोली, दृष्टि सबमें तेज दिखाई पड़ता है फिर सूनापन नहीं दिखता। 

जैसे किसी को मनहूस और किसी को बढ़िया व्यक्ति कहते हो। मनुष्य की शोभा ही बढ़ जाती है जब ज्ञान सार अंदर में प्राप्त होता है। यह सब गुरु की दया से प्राप्त होता है। जैसे गुरु सिखाते बताते कहते हैं एबीसीडी 123 लिखो तो बच्चे में हरकत आती है। ऐसे ही जब आध्यात्मिक गुरु की दया अंदर में हो जाती है तो उन्हीं शब्दों में दबाव ताकत आ जाती है। इसके बाद महाराज जी ने राजा और महात्मा जी के प्रसंग से समझाया कि किसके बात में वजन पावर होती है और कैसे आती है।

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