स्वामी विवेकानंद के 10 अनमोल विचार

दुनिया में कितने लोग आए और कितने चले गए। पर उन्ही लोगों में कुछ महान भी रहें है। उनके गुणों एवं विचारों के साथ-साथ समाज में कुछ अच्छे कार्य कर जाते है या दूसरे शब्दों में कहें तो महान पुरुष का अर्थ वह पुरुष होता है जो सामाजिक कर्तव्य एवं सामाजिक मूल्यों को ठीक प्रकार से समझे और उसका निर्वहन करें। वह भारतीय समाज को हमेशा आगे बढ़ाने का प्रयास करें और सभी भाइयों एवं बहनों की सहायता निस्वार्थ पूर्वक करें। ऐसे महापुरूषों के जीवन और विचार से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। उनके विचार में एक ऐसा गुण विद्यमान होता है कि निराश व्यक्ति भी अगर उसे पढ़े तो उसे जीवन जीने का एक नया मकसद मिल सकता है। 

इन्‍हीं में से एक हैं स्‍वामी विवेकानंद। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। 'स्वामी विवेकानंद' नाम उनको उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने दिया था। अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मलेन में आपने भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया, तथा वेदांत दर्शन का प्रसार पुरे विश्व में किया। आपने समाज के सेवा कार्य के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि जिस पल मुझे यह ज्ञात हो गया कि हर मानव के हृदय में भगवान हैं तभी से मैं अपने सामने आने वाले हर व्यक्ति में ईश्वर की छवि देखने लगा हूं और उसी पल मैं हर बंधन से छूट गया। हर उस चीज से जो बंद रखती है, धूमिल हो जाती है और मैं तो आजाद हूं। अपने ज्ञानमय विचारो से सभी को प्रभावित किया। 

आइए जानते हैं स्वामी विवेकानंद के ऐसे अनमोल विचार-

  1. दिल और दिमाग के टकराव में दिल की सुनो।
  2. ख़ुद को कमज़ोर समझना सबसे बड़ा पाप है।
  3. बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप हैं।
  4. उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए।
  5. सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।
  6. विश्व एक विशाल व्यायामशाला है जहां हम खुद को मज़बूत बनाने के लिए आते हैं।
  7. शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु हैं। विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु हैं। प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु हैं।
  8. किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आए-आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।
  9. ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम ही हैं जो अपनी आंखों पर हांथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है।
  10. तुम्हें कोई पढ़ा नहीं सकता, कोई आध्यात्मिक नहीं बना सकता। तुमको सब कुछ खुद अंदर से सीखना है। आत्मा से अच्छा कोई शिक्षक नही है।


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