राजेश शास्त्री
"संपूर्ण भूतों में मेरा प्रवेश है"
अनेक स्थानों में रहने वाले देवता जहां कहीं जो कुछ भी करते हैं वह सब मेरे लिए करते हैं ब्रह्म स्वरूप वाग् देवी स्वयं कहती हैं कि मैं जिस जिस की रक्षा करना चाहती हूं उसे सर्वश्रेष्ठ प्रभावशाली अर्थात शक्ति संपन्न बना देती हूँ। जिससे वह दूसरों की भलाई करनें में सक्षम हो जाता है। नवरात्र महापर्व आसुरी शक्ति पर दैवि शक्ति के विजय का प्रतीक है। इसलिए वर्ष में चार बार शक्ति की उपासना एवं अनुष्ठान करने का शास्त्रों में जरूरी एवं विशेष विधान है।
जिसे आम जन मानस नवरात्रि के रूप में जानते हैं और यह नवरात्रि एक पक्ष अर्थात पन्द्रह दिनों तक रहता है। प्रत्येक नवरात्रि में तांत्रिक एवं वैदिक अनुष्ठानों से भगवती के भिन्न-भिन्न रूपों की पूजा एवं प्रतिष्ठा होती है। मनुष्य जब अपने जीवन से हार जाता है और उसके सामनें चारों तरफ़ से अन्धेरा छा जाता है। तभीं वह अपनें कल्याणार्थ अध्यात्मिक शक्तियों की शरण में जाता है लेकिन तब तक उससे काफ़ी देर हो गई होती है।
किन्तु यदि वही मनुष्य समय रहते भगवती दु्र्गा की उपासना एवं मन्त्रों का भक्ति पूर्वक जप करना शुरू कर दे तो निश्चय ही उसे नाना प्रकार के बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है साथ ही उसके सौभाग्य का उदय होनें लगता है तथा उसका कभीं अमंगल भी नहीं होता और उसकी काया समस्त रोगों से मुक्त होकर निरोग बन जाती है।
इस कोरोना जैसी महामारी के लिए श्री दुर्गासप्तशती का यह वर्णित मन्त्र लोगों को कल्पवृक्ष के समान फल देने वाला निष्कीलित मन्त्र है। क्योंकि कुछ दशक पहले के समय में जब हमलों में हैज़ा तामून व चेचक रोग बड़ी माता की फैलता था तो उस समय विद्वान पुरोहितों द्वारा श्री दुर्गासप्तशती का पाठ गांव-गांव में प्रत्येक काली डि्यूहार व समय माता की आराधना करके श्री दुर्गासप्तशती का साधारण पाठ व सम्पुटित पाठ इस रोग नाशक मन्त्र से अथवा इसी मन्त्र का नियमित संख्या में विधिवत पूजा पाठ करके माली आदि के द्वारा पचरा नामक स्तुति से भगवती की आराधना होती थी।
और चौबीस घन्टों के अन्दर उक्त महामारी जनित सभीं पीड़ाएँ शान्त हो जाती थीं और वही औषधि जो पहले कम काम करती थी वही रामबॉण की तरह काम करनें लगती थीं। अस्तु यह मन्त्र बहुत ही शक्तिशाली हैं किन्तु जो जिस भाव से जप व पाठ करेगा उसे उसी भाव के अनुसार फल की प्राप्ति होगी यही सत्य है।
यहां पर माता दुर्गा जी के सकल रोगों के शमनार्थ एवं दरिद्रता विनाश के लिए प्रसिद्ध निम्नलिखित मन्त्र का लेखन प्रस्तुत किया जा रहा है। जिसका अनुसरण करके मानव मात्र तत्क्षण लाभ उठा सकते हैं।
मन्त्र एवं मन्त्र जप की विधि कुछ इस प्रकार है :
रोगानशेषानपहंसि तुष्टारूष्टातुकामान सकलानभीष्टान।
त्वमाश्रितानां न विपन्नराणाम त्वामाश्रिताह्याश्य्रतां प्रयान्ति॥
उपरोक्त मन्त्र का एक सौ आठ बार प्रतिदिन जप करनें से अथवा अनुष्ठान पूर्वक जप करने व ब्राह्मणों द्वारा करानें के साथ हवन के उपरान्त कन्या पूजन ब्राह्मण भोज आदि के कराने से सन्तुष्ट होकर भगवती दुर्गा समस्त दुर्गतियों को नष्ट करती हुईं भक्त की मनोकामना अवश्य पूर्ण कर देती हैं इसमें कुछ संशय नहीं है किन्तु ध्यान रहे कि मन्त्र जप पूर्ण रूप से सही उच्चारण में किया जाय अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकता है ।
मार्कंडेय ऋषि द्वारा पितामह ब्रह्मा जी से पूछे जाने पर ब्रह्मा जी ने देवी की 9 मूर्तियों के पृथक पृथक नाम बताएं उनमें प्रथम शैलपुत्री द्वितीय ब्रह्मचारिणी तृतीय चंद्रघंटा चतुर्थ कूष्मांडा पंचम स्कंदमाता षष्टम कात्यानी सप्तम कालरात्रि अष्टम महागौरी नवम सिद्धिदात्री हैं यह नौं शक्तियां जब आपस में एकाकार होती हैं तब जगत कल्याणी अष्टभुजी दुर्गा जी का वह स्वरूप सौम्य स्वरूप हो जाता है ।
जिसकी आराधना योगी संत मनुष्य देवता आदि सभी करते हैं क्योंकि दुर्गा की उपासना करने से दुर्गति का नाश होता है तथा दुर्भाग्य शनै: शनै: सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है इसमें संदेह करना अतिशयोक्ति होगी।


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