भाईचारे का त्यौहार है ईद-उल-फितर

 


डॉ. नजमुस्साकिब अब्बासी नदवी 

इस्लाम धर्म के दो त्यौहार ईद-उल-फितर और ईदुल अजहा (बकरीद) प्रेम, त्याग, करुणा और सौहार्द का प्रतीक है, जो सभी को गले मिलकर गिले-शिकवे भुलाने और भाईचारे को मजबूत करने का संदेश देते हैं। यह पवित्र त्यौहार दान, समानता और एकता को बढ़ावा देता है, जो समाज में शांति स्थापित करते हुए सभी को एक साथ मिलकर खुशियां बांटने के लिए प्रेरित करता है।ईद सिर्फ नमाज़ पढ़ने का नाम नहीं है बल्कि यह आपस में मिलकर प्रेम फैलाने का अवसर भी है। यह त्यौहार सामाजिक दूरियों को मिटाकर एकता का संदेश देता है और इस मौके पर लोग दुश्मनी और नफरत भूलकर एक-दूसरे के गले लगते हैं। ईद की नमाज से पहले गरीबों और जरूरतमंदों को 'फितरा देना अनिवार्य है, जो समाज में आर्थिक समानता और जरूरतमंदों के प्रति करुणा का भाव सिखाता है।

ईद की सेवइयां, नए कपड़े और उपहारों का आदान-प्रदान परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के बीच भाईचारे के बंधन को मजबूत करता है।ईद के दिन सामूहिक नमाज अमन, शांति और एकता का संदेश देती है तो वहीं दूसरी ओर यह बताती है कि हम सब एक हैं। ईद का मुख्य संदेश इंसानियत के प्रति प्रेम और एकता है, जो भाईचारे के माध्यम से समाज को एक सूत्र में पिरोता है।ईद उल फितर को खास बनाता है सदका ए फित्र। अपने आसपास गरीब लोगों को दी जाने वाली वह पूंजी, जिससे हर कोई इस त्योहार को मना सके। इस रकम से वह भी अपनी पसंद के पकवान और कपड़े ले सके। आप ईद को गौर से देखें तो फित्र की राशि को अनाज की तौल पर मापने को कहा गया है। जैसे जौ,गेहूं,खजूर या किशमिश वगैरह। हर एक को अपनी हैसियत के हिसाब से इसमें से कोई भी चीज चुनकर, उसकी एक नाप के मूल्यों के बराबर राशि दूसरे गरीब को देना अनिवार्य है। ईद उल फित्र का मतलब ही है, प्राकृतिक स्वभाव की ओर लौटना। 

यानि जहां बराबरी हो,सबके हिस्से का भोजन हो,सबके तन का कपड़ा हो,सबके सरों पर छतें हों। यह सब हासिल फितरे को पाबंदी से अदा करने से होगा। इसलिए हर परिवार के छोटे-बड़े प्रत्येक सदस्य का फितरा निकाला जाता है। सुबह ईद की नमाज से पहले ही प्रत्येक मुसलमान को फित्रा की रकम दूसरे कमजोर व्यक्ति को देनी होती है और इस तरह जकात और फित्रा की धनराशि से आर्थिक बराबरी का संदेश दिया गया है। ईदुल फितर पवित्र रमजान के खत्म होने के बाद का त्योहार है।ये एक महीने की कठिन इबादत और त्याग के साथ रब के सामने संपूर्ण समर्पण के बाद का त्योहार है। ईद को अगर रमजान की आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो यह एक ऐसा उपहार है, जो आपको एक कठिन त्याग और समर्पण के बाद मिला है। जिस तरह रमजान का जीवन में एक उद्देश्य है, उसका एक दर्शन है, एक दृष्टि है, उसी प्रकार ईद का भी एक उद्देश्य है, एक दर्शन है और एक दृष्टि है। ईद एक ऐसा आध्यात्मिक संदेश देती है, जिसमें संपूर्ण मानवता की भलाई निहित है।

 ईद के रोज हर एक से गले मिलकर सारे भेद भुलाने का संदेश दिया गया है। अगर गौर से देखें तो सामाजिक बराबरी के लिए आपस में गले मिलना सबसे बड़ा रास्ता है। जब आप ईद की खुशी में एक-दूसरे को बधाई देते हैं, तो उसमें गले मिलना उसका एक हिस्सा है। उस समय चाहे कोई राजा हो या प्रजा,चाहे कोई गुरु हो या शिष्य, चाहे पिता हो या पुत्र,चाहे अमीर हो या गरीब, शक्तिशाली हो या फिर कमजोर,आपस में बराबरी से गले मिलते हैं। बराबरी और भाईचारे का यह संदेश ईद का सबसे पवित्र संदेश है। यह मानवता के लिए मानव मात्र से प्रेम और उसके सम्मान व बराबरी को बनाए रखने का त्योहार है। 

ईद की सेंवई चाशनी के साथ घुलकर संदेश देती हैं कि जिस ईश्वर ने तुम्हारी कड़ी इबादत को देखा है, उसने तुम्हे ईद की सेवइयों की मिठास भी बख्शी है । यदि तुम जीवन भर अनुशासन का पालन करोगे,आध्यात्म की ओर मन लगाओगे, सांसारिक लोभ से खुद को दूर करोगे, मानव कल्याण को प्राथमिकता दोगे तो तुम्हारा सारा जीवन ईद की सेंवई की मिठास से भर जाएगा। ईद एक दूसरे को माफ़ करने का भी त्यौहार है। भाई भाई के गले शिकवे दूर करने का अवसर है, तमाम बुराई पीछे छोड़कर गले मिलकर चलने की सीख भी ईद देती है। अपनी की हुई ग़लती या जिस किसी का आपने दिल दुखाया हो,उससे माफ़ी मांगिये । उसके गले लगिये और प्रायश्चित कीजिये कि आप कभी दोबारा ऐसा नही करेंगे । कोई आपसे माफ़ी मांगे, तो आप उसे माफ़ कीजिये,आगे बढ़कर गले लगाइये और कहिए,ज़िन्दगी बड़ी छोटी है । हम इस सेंवई की मिठास के साथ इसे दोबारा खूबसूरत रास्तों पर लाते हैं । पैगम्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल ने भी माफ़ करने को सबसे बेहतरीन रास्ता कहा है । ईद इसलिए और खास हो जाती है कि यह पूरे साल आंख चुराने वालों को भी एक मौका देती है कि गले मिलकर, आपस के गिले शिकवे दूर कर लो।  

कहा जाता है कि ईद मानवीय आध्यात्मिक ऊंचाई का त्यौहार है।जो एक कठिन प्रशिक्षण अर्थात पूरे महीने के रोज़ा रखने के बाद आता है। दरअसल ईद अल्लाह की तरफ़ से एक त्यौहारी या ईदी है, जैसे हम अपने बच्चों को ईदी देते हैं वैसे ही अल्लाह भी हमें पूरे महीने रोज़ा रखने की खुशी में ईद के रूप में ईदी देता है। रमज़ान से ईद तक पूरा एक सफर है, जिसमे करुणा,त्याग,समर्पण,अनुशासन,भाईचारा,बराबरी,एकता और सहयोग गूंथे हुए हैं।इन्हें आत्मसात करना चाहिए,यही ईद की मुबारकबाद है।ईद का ये त्यौहार इस्लामी कैलेंडर के अनुसार शव्वाल माह की पहली तारीख को मनाया जाता है.इसलामी कैलंडर के सभी महीनों की तरह यह भी नए चांद के दिखने पर शुरू होता है. मुसलमानों का यह त्योहार पूरे विश्व में पूरे हर्षोल्लास से मनाया जाता है।ईद के दिन प्रत्येक मुसलमान अच्छे कपड़े पहन कर 2 रकात नमाज़ पढ़ने ईदगाह या किसी जुमा मस्जिद में जाता है,वहां इमाम ईद के संबंधित संबोधन देता है और लोगों को ईशभय की ओर बुलाता है।

इसी तरह जिन लोगों ने किसी कठिनाई के कारण रोजे नहीं रखे हैं वह ईद के बाद किसी भी महीने में क़ज़ा रोजे के रूप में उसे रख सकते हैं. हालांकि इन रोजों का महत्व उतना नहीं होता,इसके अलावा रोजा ना रख पाने की विशेष स्थिति में व्यक्ति अपनी एकदिन की पूरी खुराक किसी गरीब या जरूरतमंद को दे सकता है।

 (लेखक नया सवेरा फाउंडेशन ग़ाज़ीपुर के संस्थापक और सौहार्द फेलोशिप के मेंटर हैं)

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