पितृपक्ष में क्षौर कर्म निषेध!

आचार्य संजय तिवारी

क्षौर कर्म हमारे 16 संस्कारों में से एक संस्कार है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष के दिनों में यह निषिद्ध है। सनातन धर्मग्रंथों में पितृपक्ष (श्राद्ध पक्ष) के दौरान क्षौर कर्म (बाल, दाढ़ी-मूंछ कटवाना या मुंडन करना) को पूरी तरह वर्जित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति शोक, श्रद्धा और संयम व्यक्त करने का समय है, इसलिए इस अवधि में शारीरिक सौंदर्य या सजने-संवरने से जुड़े कार्य (जैसे क्षौर कर्म) निषेध हैं। विभिन्न प्रामाणिक ग्रंथों में इसके स्पष्ट श्लोक और प्रमाण इस प्रकार मिलते हैं:

1. 'निर्णयसिन्धु' तथा 'स्मृति कौस्तुभ' का प्रमाणश्राद्ध और व्रतों के दिनों में क्षौर कर्म का निषेध करते हुए 'निर्णयसिन्धु' और 'स्मृति कौस्तुभ' जैसे प्रामाणिक धर्मसिंधु ग्रंथों में महर्षि जाबालि का यह श्लोक उद्धृत किया गया है:

एकादश्यां चतुर्दश्यां श्राद्धे जननमरणे तथा।

दीक्षाकाले च व्रते च क्षौरकर्म विवर्जयेत्॥

ग्रंथ संदर्भ: निर्णयसिन्धु (क्षौरकर्म निर्णय प्रकरण) / जाबालि स्मृतिअर्थ के अनुसार एकादशी, चतुर्दशी, श्राद्ध का दिन, सूतक (जन्म और मरण का समय), गुरु-दीक्षा का समय और व्रत की अवधि में क्षौर कर्म (बाल और नाखून काटना) का पूरी तरह परित्याग (निषेध) करना चाहिए। चूँकि पितृपक्ष पूरा का पूरा 'श्राद्ध काल' माना जाता है, इसलिए इन 16 दिनों में क्षौर कर्म वर्जित है।

2.  प्रमाणब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति पर्व, व्रत या पितृ कार्यों (श्राद्ध) में क्षौर कर्म करवाता है, वह अपवित्र माना जाता है और उसे दोष लगता है:

व्रतोपवासनियम-श्राद्धकालेषु यः पुमान्।क्षौरकर्म प्रकुर्वीत स वै भवति पातकः॥

ग्रंथ संदर्भ: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार (श्रीकृष्णजन्मखण्ड) जो मनुष्य व्रत, उपवास के नियमों के समय अथवा श्राद्ध काल (जैसे पितृपक्ष) में क्षौर कर्म करता है, वह पतित (पाप या दोष का भागी) होता है।

3. 'महाभारत' (अनुशासन पर्व) का प्रमाण भी स्पष्ट है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी सदाचार के नियमों के अंतर्गत श्राद्ध पक्ष और विशेष तिथियों पर बाल-नाखून काटने को आयु का नाशक बताया गया है:

न चोत्सवेषु चौरं स्यान्न च श्राद्धेषु भारत।आयुः क्षीणं भवेत् तस्य यः करोति दिनेषु च॥

ग्रंथ संदर्भ बता रहा है कि हे भारत (युधिष्ठिर)! उत्सवों (मांगलिक कार्यों के विशेष नियमों के अतिरिक्त) तथा श्राद्ध के दिनों में कभी भी क्षौर कर्म नहीं करना चाहिए। जो इन दिनों में ऐसा करता है, उसकी आयु क्षीण होती है।

अब आते हैं लोक पद्धति पर। परंपरा में जो व्यक्ति अपने माता-पिता का मुख्य श्राद्ध या तर्पण करता है, वह पूरे पितृपक्ष में बाल नहीं कटवाता। वह केवल अपने पितर की मुख्य श्राद्ध तिथि के अगले दिन या पितृपक्ष की समाप्ति (सर्वपितृ अमावस्या) के बाद ही क्षौर कर्म करवा सकता है, लेकिन इसका भी कोई शास्त्रीय विधान मिल नहीं रहा। तीर्थ श्राद्ध के बारे में बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति पितृपक्ष में गया जी, प्रयागराज या काशी जैसे तीर्थों पर विशेष पिंड दान या गया-श्राद्ध करने जाता है, तो वहाँ 'तीर्थ मुंडन' का शास्त्रीय विधान आवश्यक माना गया है।

कुछ स्थानों पर विवरण है कि पितृपक्ष में अपने पितर का श्राद्ध करने वाले कर्ता के लिए क्षौर कर्म का विधान है, पर तिथि पर नहीं। अब यह बहुत आवश्यक लगता है कि इस बारे में शास्त्रीय निर्णय निर्णयों को देखा जाय।

श्राद्धकर्ता को क्षौर करना चाहिए - यह विहित है। गरुड़ पुराण, प्रेतकाण्ड में लिखा बताया जाता है: 

श्राद्धकर्तुः क्षौरकर्म कर्तव्यं श्राद्धात् पूर्वदिने।

श्राद्धे दिने कृते क्षौरे पितरः क्लेशमाप्नुयुः॥

यह श्लोक गरुड़ पुराण, प्रेतकाण्ड 11/20 (धर्मसिन्धु में उद्धृत) बताया गया है किंतु मूल ग्रंथ में नहीं मिलता। मूल ग्रंथ में इस क्रम पर ऐसा कोई संदर्भ उपलब्ध ही नहीं है। इसके अनुसार श्राद्ध करने वाले को श्राद्ध से एक दिन पूर्व क्षौर करना चाहिए। श्राद्ध के दिन क्षौर करने से पितरों को क्लेश होता है।

पितृपक्ष में तिथि पर मुण्डन निषेध है। इसी पर धर्मसिन्धुकार का सबसे प्रामाणिक श्लोक बताया गया है -

पितृपक्षे न कर्तव्यं क्षौरं श्राद्धदिने क्वचित्।

कृते तु तत्र क्षौरे तु केशाः पितृमुखे पतन्ति॥

तस्मात् पक्षारम्भात् पूर्वं अमावस्यायां चापराह्णके।

क्षौरकर्म प्रकुर्वीत श्राद्धकर्ता नरः शुचिः॥

धर्मसिन्धु, तृतीय परिच्छेद में ऐसा बताया गया है। इसका अर्थ है कि पितृपक्ष में श्राद्ध की तिथि पर कभी क्षौर न करे। यदि तिथि पर क्षौर किया तो बाल पितरों के मुख में गिरते हैं। इसलिए पितृपक्ष आरम्भ होने से एक दिन पहले (भाद्रपद पूर्णिमा को) या सर्वपितृ अमावस्या के अपराह्ण काल में क्षौर करे।

निर्णयसिन्धु का सार स्वरूप तथ्य है:

श्राद्धात् पूर्वं क्षौरं विहितं, श्राद्धदिने तु वर्जितम्। निर्णयसिन्धु, पितृपक्ष निर्णय से यह उद्धरण है। अंतिम सार यह समझ में आता है कि श्राद्ध करने वाले को क्षौर करना चाहिए, पर श्राद्ध वाली तिथि को नहीं। उससे एक दिन पहले, या पितृपक्ष शुरू होने से पहले। सर्वपितृ अमावस्या को दोपहर बाद ही क्षौर कर्म करे। जो लोग श्राद्ध की तिथि पर ही दाढ़ी-बाल बनवाते हैं, वह शास्त्र विरुद्ध है और पितरों को कष्ट देने वाला है। इस संदर्भ में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कर्मकांड के आधिकारिक विद्वानों के पास यदि कोई शुद्ध संदर्भ उपलब्ध हो तो लोक के लिए प्रस्तुत करना जरूरी है। पितृपक्ष में सामान्य रूप से लोक में तिथि पर बाल बनवाने को बहुत महत्व मिलता है, जबकि उपलब्ध शास्त्र मत से ऐसा करना उचित नहीं है। विद्वत जन मार्गदर्शन अवश्य करें।

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