कुलपति की कुर्सी: विश्वविद्यालय की मर्यादा या सत्ता की पसंद

विनीत कुमार सिंह

जब शिक्षा के सर्वोच्च पद पर योग्यता से अधिक निकटता की चर्चा होने लगे, तब सवाल केवल नियुक्ति का नहीं, विश्वविद्यालय की आत्मा और राष्ट्र के बौद्धिक भविष्य का होता है। विश्वविद्यालय किसी सरकार का विभाग नहीं होता। वह राष्ट्र की बौद्धिक चेतना का वह परिसर है, जहाँ सत्ता से स्वतंत्र होकर ज्ञान प्रश्न करता है, शोध सत्य की खोज करता है और शिक्षक आने वाली पीढ़ियों को केवल डिग्री नहीं, दृष्टि देता है। इसी कारण कुलपति का पद महज प्रशासनिक कुर्सी नहीं, विश्वविद्यालय के कुल की मर्यादा का प्रतिनिधित्व है।

‘कुलपति’ शब्द में ही ‘कुल’ की परंपरा और ‘पति’ का संरक्षण निहित है। इस पद पर बैठने वाला व्यक्ति विश्वविद्यालय की अकादमिक संस्कृति, अनुशासन, शोध और संस्थागत गरिमा का संरक्षक माना जाता है। इसलिए स्वाभाविक प्रश्न है,क्या इस पद की पहली कसौटी राजनीतिक पसंद होनी चाहिए या अकादमिक योग्यता?

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों और विश्वविद्यालयों के बीच संबंध स्वाभाविक हैं। शिक्षा नीति, वित्त, प्रशासन और नियमन में सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन सरकार की भूमिका और विश्वविद्यालय की अकादमिक आत्मनिर्भरता एक ही बात नहीं है। विश्वविद्यालय की शक्ति तभी जीवित रहती है जब उसके निर्णयों में विद्वता, पारदर्शिता और संस्थागत प्रक्रिया का सम्मान हो।

आज चिंता इस बात से पैदा होती है कि कुलपति नियुक्तियों को लेकर बार-बार ऐसे सवाल उठते हैं जिनमें योग्यता के साथ राजनीतिक निकटता, पसंद और प्रभाव की चर्चा सामने आती है। इन चर्चाओं को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप कहकर खारिज कर देना भी पर्याप्त नहीं है। क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति या किसी एक सरकार का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो यह तय करती है कि विश्वविद्यालय का नेतृत्व किस आधार पर चुना जाएगा।

कुलपति के लिए सबसे बड़ी पूंजी कोई राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि उसका शैक्षणिक जीवन होना चाहिए,उसका शोध, प्रकाशित कार्य, विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच उसकी प्रतिष्ठा, संस्थान चलाने की क्षमता, प्रशासनिक अनुशासन और शिक्षा के भविष्य को लेकर उसकी दृष्टि।

यदि इन कसौटियों के स्थान पर किसी पद के लिए ‘किसकी पसंद’ और ‘किसके निकट’ जैसे प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो जाएँ, तो विश्वविद्यालय धीरे-धीरे ज्ञान के केंद्र से शक्ति-संबंधों के केंद्र में बदल सकता है।

और यहीं से दूसरा, अधिक गंभीर प्रश्न जन्म लेता है—क्या शिक्षा भी बाजार की भाषा में समझी जाने लगेगी?

बाजार में वस्तु खरीदने के लिए मूल्य चुकाया जाता है। यदि शिक्षा और उसके शीर्ष पद भी किसी प्रकार के लेन-देन की संस्कृति से प्रभावित होने लगें, तो खतरा केवल एक पद की गरिमा तक सीमित नहीं रहेगा। उसका प्रभाव शिक्षक नियुक्ति, शोध की दिशा, विद्यार्थियों के विश्वास और अंततः डिग्री की विश्वसनीयता तक पहुँच सकता है।

यहाँ सावधानी जरूरी है। किसी व्यक्ति पर बिना प्रमाण आरोप लगाना न्यायसंगत नहीं। लेकिन व्यवस्था पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार ही नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी भी है। इसलिए कुलपति नियुक्तियों की प्रक्रिया जितनी अधिक पारदर्शी, स्पष्ट और सार्वजनिक कसौटियों पर आधारित होगी, उतना ही विश्वविद्यालयों का विश्वास मजबूत होगा।

कुलपति का चयन किसी बंद कमरे की फुसफुसाहट नहीं होना चाहिए। चयन प्रक्रिया में ऐसी स्पष्ट कसौटियाँ होनी चाहिए जिनसे यह समझा जा सके कि उम्मीदवार की अकादमिक उपलब्धियाँ क्या हैं, शोध में उसका योगदान क्या है, प्रशासनिक अनुभव कितना है और विश्वविद्यालय के विकास की उसकी दृष्टि क्या है।

राष्ट्र की शक्ति अंततः केवल हथियारों, उद्योगों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं बनती। राष्ट्र की दीर्घकालीन शक्ति उसके ज्ञान, शोध, वैज्ञानिक दृष्टि, शिक्षा और चरित्रवान नागरिकों से बनती है। इसलिए विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता पर समझौता करना वास्तव में राष्ट्र के भविष्य पर समझौता करना है।

आज आवश्यकता किसी दल विशेष के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्रीय विमर्श की है जिसमें सत्ता से जुड़े लोग भी यह स्वीकार करें कि विश्वविद्यालय की कुर्सी सत्ता की संपत्ति नहीं और कुलपति किसी राजनीतिक कृपा का प्रतीक नहीं होना चाहिए।

सरकारें आती-जाती रहेंगी। राजनीतिक दल बदलते रहेंगे। सत्ता के समीकरण भी बदलेंगे। लेकिन विश्वविद्यालय पीढ़ियों तक रहते हैं। एक सरकार का कार्यकाल पाँच वर्ष हो सकता है, पर विश्वविद्यालय की एक गलत परंपरा कई पीढ़ियों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए समय रहते प्रश्न पूछना जरूरी है। कुलपति कौन बने, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वह किस कसौटी पर बने?

यदि कसौटी ज्ञान है तो विश्वविद्यालय मजबूत होगा।

यदि कसौटी शोध है तो राष्ट्र आगे बढ़ेगा।

यदि कसौटी अनुशासन है तो संस्थान टिकेगा।

यदि कसौटी पारदर्शिता है तो विश्वास बचेगा।

लेकिन यदि कसौटी केवल राजनीतिक पसंद और निकटता बन गई, तो विश्वविद्यालय की आत्मा पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जहाँ डिग्री ज्ञान की पहचान हो, पद योग्यता की पहचान हो और कुलपति विश्वविद्यालय की मर्यादा की पहचान हो।

विश्वविद्यालय को बाजार बनने से रोकना केवल शिक्षकों की जिम्मेदारी नहीं है। यह समाज, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों और शासन,सभी की साझा जिम्मेदारी है। क्योंकि जिस दिन विश्वविद्यालय में ज्ञान से अधिक संबंध, शोध से अधिक सिफारिश और योग्यता से अधिक पहुंच महत्वपूर्ण हो जाएगी, उस दिन खतरा केवल कुलपति की कुर्सी को नहीं होगा।

खतरा उस विश्वास को होगा जिस पर पूरी शिक्षा व्यवस्था खड़ी है। और इसलिए आज सबसे जरूरी आवाज यही है। विश्वविद्यालय को राजनीति से नहीं, राजनीति को विश्वविद्यालय की अकादमिक मर्यादा से सीखने की आवश्यकता है। कुलपति की कुर्सी पर व्यक्ति कोई भी बैठे, उस कुर्सी की पहली पहचान सत्ता नहीं, विद्या होनी चाहिए।



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